चाहमान शासकों के कुल देवता – शिव हर्षनाथ का यह मंदिर हर्षगिरी पर स्थित हैं तथा महामेरु शैली में निर्मित हैं । विक्रम संवत 1030 (973 ई.) के एक अभिलेख के अनुसार इस मंदिर का निर्माण चाहमन शासक विग्रहराज प्रथम के शासनकाल मे एक शैव संत भावरक्त द्वारा करवाया गया था। मन्दिर मे एक गर्भगृह, अंतराल, कक्षासन युक्त रंग मंडप एवं अर्द्धमंडप के साथ एक अलग नदी मंडप भी है। अपनी मौलिक अवस्था मे यह मन्दिर एक शिखर से परिपूर्ण था जो अब खंडित हो चुका है। वर्तमान खंडित अवस्था में भी यह मन्दिर अपनी स्थापत्य विशिष्टताओं एवं देवी-देवताओं की प्रतिमाओं सहित नर्तकों, संगीतज्ञों, योद्धाओं व कीर्तिमुख के प्रारूप वाली सजावटी दृश्यावलियों के उत्कृष्ट शिल्प कौशल हेतु उल्लेखनीय है। इस मन्दिर से संलग्न एक ऊंचे अधिष्ठान पर स्थित दूसरा मन्दिर उत्तर मध्यकालीन है, तथा शिव को समर्पित है। कुछ दूरी पर स्थित एक अन्य मन्दिर भैरव को समर्पित है। - सुजस, (अप्रैल 2012 राजस्थान) से साभार।
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"A person should not be too honest. Straight trees are cut first and honest people are hooked first."
- Chanakya quotes(Indian politician, strategist and writer, 350 BC-275 BC)
Sunday, June 24, 2012
अनमोल राजस्थान : - हर्षनाथ मंदिर, सीकर
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Monday, May 28, 2012
राजस्थान के प्रमुख एतिहासिक एवं दर्शनीय स्थलR
राजस्थान के प्रमुख एतिहासिक एवं दर्शनीय स्थल
- हवामहल – जयपुर
- जंतर मंतर - जयपुर
- गलता जी – जयपुर
- जसवंत थड़ा – जोधपुर
- पटवों की हवेली – जैसलमेर
- सालिम सिंह की हवेली – जैसलमेर
- रामगढ़ की हवेलियां – जैसलमेर
- नथमल की हवेली – जैसलमेर
- चौरासी खंभों की छतरी – बूँदी
- रानी जी की बावड़ी – बूँदी
- क्षार बाग की छतरियाँ – बूँदी
- स्वर्ण या सुनहरी कोठी – टौंक
- विजय स्तम्भ – चित्तौड़
- कीर्ति स्तम्भ – चित्तौड़
- सर्य मंदिर – झालावाड़
- ढाई दिन का झोंपड़ा – अजमेर
- जल महल – जयपुर, डीग व उदयपुर
- अरथूना के प्राचीन मंदिर - बाँसवाड़ा
- भांडासर जैन मंदिर – बीकानेर
- गैप सागर – डूंगरपुर
- बिड़ला तारामंडल – जयपुर
- कोलवी की गुफाएँ – झालावाड़
- उम्मेद भवन – जोधपुर
- मंडोर – जोधपुर
- भंड देवरा मंदिर – कोटा
- सज्जनगढ़ – उदयपुर
- आहड़ संग्रहालय – उदयपुर
- हर्ष मंदिर - सीकर
- द्वारकाधीश मंदिर - कांकरोली राजसमंद
- आभानेरी मंदिर - दौसा
- सच्चिया माता मंदिर - ओसियां जोधपुर
- रानी पद्मनी महल - चित्तौड़गढ़
- सहेलियों की बाड़ी - उदयपुर
- कुंभलगढ़ - केलवाड़ा राजसमंद
- ब्रह्मा मंदिर – पुष्कर
- देव सोमनाथ मंदिर- डूंगरपुर
- फखरुद्दीन की दरगाह - गलियाकोट, डूंगरपुर
- आमेर किला - आमेर, जयपुर
- रणकपुर जैन मंदिर - सादड़ी, पाली
- सांवलिया जी मंदिर - मंडफिया, चित्तौड़गढ़
- सास-बहू के प्राचीन मंदिर ( प्राचीन नागदा राज्य के मंदिर) - कैलाशपुरी, उदयपुर
- जगत के प्राचीन मंदिर - जगत गाँव उदयपुर
- श्रीनाथजी मंदिर - नाथद्वारा, राजसमंद
- मीरा बाई का मंदिर - मेड़तासिटी, नागौर
- बाबा रामदेव मंदिर - पोकरण के पास रामदेवरा, जैसलमेर
- नाकोड़ा पार्श्वनाथ मंदिर - बालोत्तरा के पास, जिला बाड़मेर
- दिलवाड़ा जैन मंदिर - माउंट आबू
- सालासर बालाजी - सालासर, चुरू
- खाटू श्यामजी - खाटू गाँव सीकर
- सोनीजी की नसियाँ - अजमेर
RAJASTHAN 3rd GRADE TEACHERS EXAM Admit Card
RAJASTHAN 3rd GRADE TEACHERS EXAM Admit Card
Thursday, May 17, 2012
इस तरह अमर हो गया 18 वीं सदी के एक राजा का प्रेम!......बनी-ठनी
पूरे विश्व में अपना परचम फहराने वाली इन्ही कलाओं में से एक कला हैं यहां की लघु चित्रकारी|जिसकी शुरुआत मुगलों के द्वारा की गई थी| इस कला को फराज (पार्शिया) से लाया गया था| हुमायु ने फ़राज़ से चित्रकारों को बुलाया था, बाद में अकबर ने इसे बढ़ावा देने के लिए एक शिल्प कला का निर्माण करवाया था| फ़राज़ के कलाकारों ने इस भारतीय कलाकारों को इस कला का प्रशिक्षण दिया, बाद में इस खास शैली में तैयार किये गए चित्र राजस्थानी चित्र या राजपूत चित्र कहलाए|
बनी-ठनी
अठारहवीं सदी में राजस्थान के किशनगढ़ प्रान्त में एक नई कला ने जन्म लिया जिसे आज भी बनी ठनी के नाम से जाना जाता है|
इस कला का जन्म महाराजा सावंत सिंह के शासन काल में हुआ था|
कहा जाता है कि महाराजा सावंत सिंह को बनी ठनी नामक एक दासी से प्रेम हो गया था, तब उन्होंने उस समय के कलाकारों को आदेश दिया कि वे कृष्ण-राधा के प्रेम चित्रों के रूप में उनकी और उनकी प्रेमिका की तस्वीरें बनाएं|
बाद में यह चित्रकारी इतनी प्रसिद्ध हो गई कि इसे भारत की मोनालिसा के नाम से जाना जाने लगा|
आज भी देश-विदेश में बनी ठनी का एक अलग ही मुकाम है|
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बनी-ठनी,
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राजपूत चित्र,
राजस्थानी चित्र
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